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वो शख्स जिसने तीन साल तक वेतन न लेकर झुका दी सरकार

 संकलनकर्ता वेद भदोला

जगदीश चंद्र बसु भारत के महान वैज्ञानिक थे। उन्हें जे सी बोस के नाम से भी जाना जाता है। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्हें भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान तथा पुरातत्व शास्त्र का गहरा ज्ञान था।

उनका जन्म तत्कालीन बंगाल के मेमनसिंह नगर में हुआ। यह इलाका अब बांग्लादेश में है। बसु की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही एक छोटे से बंगाली स्कूल में हुई और यहीं से उनकी रुचि पेड़-पौधों की दुनिया में जगी। स्कूली शिक्षा के बाद जगदीश कलकत्ता चले आए और यहां उन्होंने सेंट जेवियर स्कूल में दाखिला लिया। यहां से उन्होंने भौतिक विज्ञान की पढ़ाई की।

आगे की पढ़ाई के लिए वे अमेरिका गए, लेकिन बीमार रहने के कारण वे अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। इसके बजाय, उन्होंने कैम्ब्रिज में नोबेल विजेता लॉर्ड रेले के साथ अपना शोध किया। 1885 में वे भारत लौट आए और भौतिकी के सहायक प्राध्यापक के रूप में प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ाने लगे। उस समय भारतीय शिक्षकों को अंग्रेजों के मुकाबले कम वेतन दिया जाता, जिसका बसु ने घोर विरोध किया। वेतन में बराबरी की मांग करते हुए उन्होंने तीन वर्ष तक वेतन नहीं लिया। बाद में सरकार को झुकना पड़ा।

रेडियो और सूक्ष्म तरंगों पर अध्ययन करने वाले जगदीश चंद्र बसु पहले भारतीय वैज्ञानिक थे। बसु ने एक ऐसे यंत्र का निर्माण किया था, जिससे 5 मिलीमीटर से लेकर 25 मिलीमीटर तक के आकार वाली सूक्ष्म रेडियो तरंगें उत्पन्न की जा सकती थीं। नवंबर 1894 में बसु ने कलकत्ता के टाउन हॉल में अपनी रेडियो तरंगों का प्रदर्शन किया। आज का रिमोट कंट्रोल सिस्टम उनकी इसी धारणा पर आधारित हैं।

कॉलेज में पढ़ाने के साथ बसु ने अपना शोध कार्य जारी रखा। शोध करते हुए उन्होंने वायरलेस सिग्नलिंग की खोज में उल्लेखनीय प्रगति की। जगदीश चंद्र बसु पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो संकेतों का पता लगाने के लिए सेमीकंडक्टर जंक्शनों का इस्तेमाल किया था।

बसु ने वनस्पति शास्त्र में भौतिकी विज्ञान और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया, जिसे उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। बसु ने पूरी दुनिया को बताया कि पेड़-पौधों में भी जीवन होता है।

अमेरिका से पेटेंट प्राप्त करने वाले वे पहले भारतीय वैज्ञानिक थे। जगदीश चंद्र बसु को रेडियो विज्ञान का पिता कहा जाता है। बसु विज्ञान कथाएं भी लिखते थे और उन्हें बंगाली विज्ञान कथा-साहित्य का पिता भी कहा जाता है। 1896 में, बोस ने ‘निरुद्देशर कहिनी’ (द स्टोरी आॅफ द मिसिंग वन) नाम की एक छोटी कहानी लिखी थी, जिसे बाद में विस्तारित किया गया।

1917 में जगदीश चंद्र बसु को ‘नाइट’ की उपाधि दी गई। 1920 में वे ‘रॉयल सोसाइटी’ के फेलो भी चुने गए। 1927 में इंडियन साइंस कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। बसु ने अपना पूरा शोधकार्य बिना किसी अच्छे उपकरण और प्रयोगशाला के किया था इसलिए वे एक अच्छी प्रयोगशाला बनाना चाहते थे। ‘बोस इंस्टीट्यूट’ (बोस विज्ञान मंदिर) इसी सोच का परिणाम है जोकि विज्ञान में शोधकार्य के लिए राष्ट्र का एक प्रसिद्ध केंद्र है।

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