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लुहां-दिगोली गांव की मातृशक्ति नें बंजर भूमि पर उगाया विशाल जंगल

पर्यावरण दिवस पर विशेष

संजय चौहान

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। आज पर्यावरण बचाने को लेकर बड़े बड़े शहरों के एसी कमरों में इस पर विद्वानों द्वारा एक दिन का मंथन होगा, जिसके बाद पूरे साल मौन रहकर पर्यावरण बचायेंगे। इन सबसे इतर आज आपको दो गांव की महिलाओं की मेहनत से रूबरू करवायेंगे, इन महिलाओं नें बिना किसी शोर-शराबे के बीच चुपचाप अपनें अथक प्रयासों से बंजर भूमि पर विशाल जंगल खड़ा है, जिसमें वर्तमान में लगभग 200 प्रजाति के 5 लाख पेड है मौजूद।

70 के दशक के वन आंदोलन नें पूरे उत्तराखंड के आम जनमानस को प्रभावित किया। खासतौर पर गौरा देवी के अंग्वाल (चिपको आंदोलन) नें ग्रामीणों को पेडो और जंगलों की उपयोगिता और निर्भरता के असल मायनों से अवगत कराया। इस आंदोलन के दौरान ही चमोली की धान की डलिया, सदावर्त पट्टी के रूप में विख्यात सांस्कृतिक त्रिवेणी धरा बंड पट्टी के दो गांव लुहां- दिगोली की महिलाओं नें बंजर भूमि में पेड़ लगाने का बीड़ा अपने हाथों में लिया। दिगोली गांव के हुकुम सिंह रावत और लुहां गांव के धन सिंह नेगी जो चिपको आंदोलन के सहयोगी थे बताते हैं कि गांव में जंगल न होने से दोनों गांव के ग्रामीण को अपने मवेशियों के लिए चारा और ईधन के लिए लकड़ी हेतु पडोसी गांवों के जंगलों में भटकना पडता था। हर रोज ग्रामीणों को 10 से 15 किमी जाना पड़ता था। चिपको आंदोलन नें ग्रामीणों को प्रोत्साहित किया परिणामस्वरूप आज ग्रामीणों के पास खुद का जंगल है।

गांव में लकड़ी, चारा-पत्ती और पानी की समस्या से निजात पाने के लिए 45 साल पहले शुरू की गई लुहां दिगोली गांव की महिलाओं की मेहनत आखिरकार रंग लाई। महिलाओं ने स्वयं के प्रयासों से गांव में बांज, बुरांश, अंग्यार, काफल, फनियाट, पंय्या, अखरोट, आडू, समेत कई पौधे लगाए थे जहां अब विशाल जंगल बन गया है। इस जंगल से आज गांव के पुराने पेयजल स्रोत रिचार्ज हो रहे हैं तो कई जगह नये जलस्रोत फूट गये हैं।

लुहां दिगोली की महिलाओं नें इस जंगल में उगे पेड़ो को अपने बच्चों की तरह पाला। गांव में पानी की भारी कमी थी, लिहाजा महिलाओं ने अपने पीने के पानी से पौधों को सींचने के लिए पानी दिया। महिलाओं नें अपनी पीठ पर गोबर, खाद-पानी ढोकर पौधों को दिया। विगत 25 सालों से यही जंगल अब ग्रामीणों के मवेशियों के लिए चारा और ईधन व कृषि कार्य हेतु लकड़ी उपलब्ध करा रहा है। लुहां दिगोली के क्षेत्र पंचायत सदस्य सुनील कोठियाल बताते हैं कि ये जंगल पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक सहभागिता का सबसे बड़ा उदाहरण है। आज हमें ये पेड़ जल स्रोतों को रिचार्ज कर लगभग 1000 लोगों को पानी, चारा-पत्ती और ईधन हेतु लकड़ी दे रहे हैं। साथ ही पशुपालन और दुग्ध उत्पादन के जरिए गांव में ही रोजगार भी पैदा कर रहे हैं।

लुहां दिगोली की महिलाओं नें इस जंगल को अपना मायका माना। बिमला कोठियाल, मंगला देवी बिष्ट, चंपा देवी, रूद्रा देवी, वरदेई देवी, पार्वती देवी, काश्मीरा देवी, उमा देवी, शकुन्तला देवी, अनीता देवी, सुनीता देवी सहित दोनों गांवों की समस्त मात्रृशक्ति नें इस जंगल को मायके की तरह माना।

गांव के इस जंगल की रखवाली खुद ग्रामीण करते हैं। हर साल जंगल से चारा काटने के लिए एक निश्चित समयावधि निश्चित की जाती है। जिसके तहत ग्रामीण द्वारा चारे के लिए केवल पेड़ो की पत्तियों को कटाई छंटाई करके मवेशियों को लाई जाती है। जिससे पेड को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचता है। इसके अलावा ये जंगल चारा के साथ धार्मिक कार्यों में प्रयुक्त होने वाली लकड़ी भी उपलब्ध कराता है, जैसे पांडव नृत्य के अवसर पर मोरी डाली और पदम वृक्ष-पंय्या डाली। दिगोली गांव के ग्राम प्रधान सुनैना पुरोहित और लुहां गांव के ग्राम प्रधान नरेंद्र लाल कहते हैं कि पिछले साल पडोसी गांव के जंगल से हमारे लुहां दिगोली के जंगल के कुछ हिस्सों में भी आग लग गयी थी। जंगल में आग की लपटें देखकर दोनों गांव की महिलाएं अपने जंगल को बचाने के लिए दौड़ पडी। गांव की महिलाओं नें जान जोखिम में डालकर आग को बुझाया और जंगल को जलने से बचाया। इस सराहनीय कार्य हेतु वन विभाग नें महिला मंगल दल लुहां को पुरुष्कार के रूप में 10 हजार रूपये भी दिये। लुहां गांव की महिला मंगल दल अध्यक्षा गीता देवी और वन पंचायत सरपंच मीना देवी कहती है कि ये जंगल उनके लिए हरा सोना है। इसकी रक्षा करना हमारा हमारा परम कर्तव्य है।

वास्तव में देखा जाए तो बंड पट्टी के दो गांवों की ये महिलायें लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। बंजर भूमि पर विशाल जंगल उगाकर इन्होंने दिखा दिया की पहाड़ की मात्रृशक्ति अगर ठान लें तो कोई भी कार्य असंभव नहीं हैं।

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