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बर्त्वाल के बहाने उत्तराखंडी साहित्य सँस्कृति पर गंभीर चिंतन

नितेश जोशी
रामनगर। हिंदी के वरिष्ठ कवि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल की याद में दो दिवसीय संगोष्ठी आज खत्री सभा में शुरू हुई।संगोष्ठी में चन्द्रकुंवर बर्त्वाल के जीवन,साहित्यिक कार्यों पर विभिन्न क्षेत्रों से आये विद्वतजनों ने बातचीत रखी। 

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई।ततपश्चात देहरादून से आये हिमवंत कवि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल शोध संस्थान सोसायटी के सचिव डॉ योगम्बर सिंह बर्त्वाल ने चन्द्रकुंवर बर्त्वाल के साहित्य पर सारगर्भित वक्तव्य दिया।  उन्होंने कहा कि यह वर्ष चन्द्रकुंवर बर्त्वाल  का जन्म शताब्दी बर्ष है।।चन्द्रकुंवर बर्त्वाल के जन्मशताब्दी के मौके पर उनकी कविताओं के कलेन्डर का भी अनावरण किया गया।कुमांऊनी  के वरिष्ठ साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल ने कहा कि बर्त्वाल ने 28 साल की छोटी सी उम्र में जितना स्तरीय साहित्य रचा है वह विश्वस्तरीय है। हिंदी के वरिष्ठ कवि निराला तक ने उनकी कविताओं की प्रशंसा की।उनकी कविताओं में जीवन के विविध नए नए आयाम मिलते हैं।

उन्होंने कहा आज पलायन का असर हमारी भाषा और संस्क्रति पर भी स्पष्ट रूप से  देखा जा सकता है।
महाविद्यालय बेतालघाट के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ अधीर कुमार ने कहा कि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल जीवन के अंतिम समय में टी बी  के मरीज हो गए और उस समय टी बी को असाध्य बीमारी माना जाता था।  इसके बाबजूद उन्होंने न केवल प्रकृति पर बल्कि राजनीति पर भी काफी उच्च कोटि के कविताएं लिखी हैं।
  इस अवसर पर अभिनय नाट्य संस्था के मानसी रावत,ललित बिष्ट,तुषार,विजय जामवाल,नीरज चौहान,संदीप सोढ़ी द्वरा चन्द्रकुंवर बर्त्वाल की कविताओं की संगीतमय प्रस्तुति दी गयी। भाषा संस्थान के पूर्व उपनिदेशक डॉ नागेंद्र ध्यानी ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम के पहले सत्र की अध्यक्षता डॉ अधीर कुमार ने की। 

इस अवसर पर आधार व्याख्यान देते हुए मितेश्वर आनंद ने हिमवंत कवि के काव्य संसार के वृहद आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने चन्द्रकुंवर को हिमालयी भूमि पर जन्में एक महान कवि की संज्ञा दी जिसका स्थान और योगदान दोनों हिंदी साहित्य में अद्वितीय है।
हिमवंत कवि की रचनाओं में बसे हिमालय का उल्लेख करते हुए उनकी तुलना कालिदास से की। कहा कि साहित्य जगत में कालिदास ने जिस प्रकार हिमालय पर लिखा है उसकी बानगी हिंदी काव्य में चन्द्रकुंवर कई काव्य रचनाओं में ही देखने को मिलती है।
उन्होंने हिमवंत कवि के रचना संसार में हिमालय के साथ साथ तत्समय के समाज, संस्कृति,धर्म राजनीति पर भी विस्तृत लेखन किया। उन्होंने यह भी कहा कि नचिकेता  के बाद केवल चन्द्रकुंवर ने ही यह संवाद किया।
उन्होंने चन्द्रकुंवर के काव्य की प्रासंगिकता को सर्वकालिक बताते हुए युवाओं से चन्द्रकुंवर के जीवन और साहित्य के बारे में जानने और उसे जीवन में अपनाने की अपील की। अगस्तमुनि ,रुद्रप्रयाग से पहुंचे चन्द्रकुंवर बर्त्वाल स्मृति शोध संस्थान के अध्यक्ष हरीश गुसांई ने कहा कि आज उनके प्रकाशित साहित्य को जहां एक ओर जन जन तक पहुंचाने की जरूरत है वहीं दूसरी ओर उनके अप्रकाशित साहित्य को खोज कर प्रकाशित किये जाने की आवश्यकता है।
इस मौके पर समाजवादी विचारक पूर्व विधायक रामदत्त जोशी को भी उनके साहित्य के साथ याद किया गया। ढेला से पहुंची सांस्कृतिक टीन उज्यावक दगडी द्वारा भी गीत प्रस्तुत किये गए।
धर्मेंद्र नेगी और नीरज बवाड़ी के संचालन में सम्प्पन कार्यक्रम में गजेंद्र रौतेला,जगवीर बर्त्वाल,अतुल मेहरोत्रा,जगदीश जोशी,डॉ सरस्वती कोहली,इमरान खान, जयपाल रावत,भुवन चन्द्र जोशी,वीरेंद्र रॉजर,डॉ आशा जोशी,दिनेश ध्यानी,हरिमोहन मोहन,नवीन तिवाड़ी,निखिलेश उपाध्याय,नन्दराम,नवेन्दु मठपाल,कुबेर अधिकारी,कैलाश लोहनी,गिरीश चन्द्र पांडे मौजूद रहे।देर शाम भोर नाट्य संस्था द्वारा उत्तराखण्ड की लोक गाथाओं पर एक नाटक का मंचन भी किया गया।

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