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जीरो टॉलरेंस के नाम पर प्रदेश की जनता से मजाक

     भ्रष्टाचार और कांग्रेस के खिलाफ भारी भरकम जनमत हासिल कर उत्तराखंड की सत्ता पर काबिज हुई त्रिवेन्द्र सरकार में एक एक कर सभी कांग्रेसियों को क्लीन चिट दे रही इस सरकार की नीतियों पर एक प्रश्न चिन्ह है इन्द्रेश मैखुरी की विस्तृत रिपोर्ट 

उत्तराखंड में 2017 में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई और त्रिवेन्द्र रावत मुख्यमंत्री बनाए गए तो उन्होंने कहा कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस की नीति पर चलेगी. लेकिन इन दो सालों में सरकार की कार्यप्रणाली को देखें तो साफ है कि ज़ीरो टॉलरेंस भी एक जुमला से ज्यादा कुछ नहीं है.
जिस समय भाजपा सरकार सत्तासीन हुई,लगभग उसी समय एन.एच 74 का घोटाला सामने आया था. इस मामले में उधमसिंह नगर जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा किए जाने के लिए हुए भूमि अधिग्रहण के मुआवजा वितरण में बड़ा खेल हुआ और करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा कर दिया गया.इस प्रकरण में लेखपाल से लेकर पी.सी.एस. अधिकारियों की संलिप्तता उजागर हुई और जिले के जिलाधिकारी रहे आइ.ए.एस अफसरों पर भी उंगली उठी. इस मामले से ही ज़ीरो टॉलरेंस के इस नारे का उदय हुआ. लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत के भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस के नारे की पहली हवा, केंद्र सरकार के सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने ही निकाल दी. मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने विधानसभा में इस मामले की सी.बी.आई जांच की घोषणा की. लेकिन राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अधिकारियों को जांच के शिकंजे में आता देख गडकरी ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए जांच से अधिकारियों का मनोबल प्रभावित होने का हवाला दे कर,सी.बी.आई जांच का विरोध किया. अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार को गडकरी ने लगभग धमकी देते हुए लिखा कि अफसरों का मनोबल तोड़ने वाली कार्यवाही यदि होगी तो आगे जो परियोजनाएं राज्य को मिलने वाली हैं,उन पर भी इसका असर पड़ेगा. बहरहाल गडकरी की चिट्ठी,राज्य की विधानसभा में दिये मुख्यमंत्री के आश्वासन पर भारी पड़ी और इस घोटाले की सी.बी.आई. जांच न हो सकी. यह ज़ीरो टॉलरेंस के नारे के उदय के साथ ही उसकी हवा निकलने का पहला उदाहरण था.
राज्य सरकार की जांच इस मामले में जारी रही. कई पी.सी.एस. अफसर निलंबित और गिरफ्तार हुए. दो आई.ए.एस अफसर-चंद्रेश कुमार यादव और डा. पंकज कुमार पांडेय भी निलंबित किए गए. ज़ोरशोर से इनके जल्द ही जेल जाने के हवा भी उड़ाई गयी. लेकिन जितनी धूम से ये दोनों आई.ए.एस अफसर निलंबित किए गए थे,उतनी ही खामोशी से बहाल कर दिये गए.
ताज़ातरीन स्थिति ये है कि एन.एच.74 घोटाले में साल भर से निलंबित चल रहे 5 पी.सी.एस अफसरों को चुपचाप बहाल कर दिया गया है. यह कार्यवाही लोकसभा चुनाव परिणाम आने के अगले दिन हुई. लगता है कि भाजपा की प्रचंड जीत का पहला तोहफा भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे इन अफसरों को ही मिला है.
दूसरा मामला लोकसभा चुनाव के दौरान का है. उत्तराखंड जैसे शांत राज्य में पुलिस कैसे अपराध के शिकंजे में फँसती जा रही है,यह प्रकरण उसका भयानक संकेत देता है. लोकसभा चुनाव के दौरान एक प्रॉपर्टी डीलर की गाड़ी की तलाशी पुलिस ने ली. प्रॉपर्टी डीलर की कार में एक बैग था,जिसमें करोड़ रुपया होने का अनुमान था. इतनी बड़ी धनराशि कार में होने पर रुपया जब्त करने की बात कहते हुए पुलिस वालों ने बैग रख दिया और प्रॉपर्टी डीलर को सड़क पर छोड़ दिया. बाद में मालूम पड़ा कि जिस व्यक्ति ने प्रॉपर्टी डीलर को पैसे दिये थे,उसी के इशारे पर पुलिस वालों ने पैसे लूट लिए थे. यह चुनाव आचार संहिता में बड़ी धनराशि जब्त करने के नाम पर पुलिस के लोगों द्वारा की गयी लूट थी,जिसमें एक दारोगा और दो अन्य पुलिस कर्मी शामिल थे.इस लूटकाण्ड में गढ़वाल परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक की सरकारी गाड़ी का प्रयोग पुलिस कर्मियों ने किया था. 4 अप्रैल को घटित यह पुलिसिया लूट की वारदात की रिपोर्ट ही 5 दिन बाद दर्ज हो सकी और 11 अप्रैल को इस घटना की खबर अखबारों में आ सकी. उत्तराखंड पुलिस के डी.जी.पी को लोग भला आदमी बताते हैं. लेकिन उनकी फोर्स के लोग जब ऐसी लूट की वारदात को अंजाम देंगे तो मात्र उनके भलेपन से पुलिस की लाज कैसे बचेगी ?
बहरहाल,इस लूटकाण्ड की भी ताजातरीन स्थिति यह है कि इस वारदात के सभी आरोपी जमानत पा कर जेल से बाहर आ चुके हैं.
इन दोनों ही मामलों में एक रोचक तथ्य,इनका कांग्रेस कनैक्शन है. एन.एच 74 का घोटाला कांग्रेस सरकार के काल में हुआ.दूसरे मामले में पुलिस ने जिस प्रॉपर्टी डीलर से सांठगांठ कर,लूटकांड को अंजाम दिया,उसका भी कांग्रेस कनैक्शन उजागर हुआ.
बावजूद इसके दोनों ही मामलों में त्रिवेन्द्र रावत की सरकार ने जिस तरह हल्का हाथ रखा,उससे समझा जा सकता है कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही में ज़ीरो है और भ्रष्टाचार के प्रति टॉलरेंस उसके पास भरपूर है.

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