क्या रेल निजीकरण की बात महज अफ़वाह है

शब्द दूत ब्यूरो 

नई दिल्ली। एशिया के दूसरे सबसे बड़े रेल नेटवर्क और एकल सरकारी स्वामित्व वाले विश्व के चौथे सबसे बड़े रेल नेटवर्क यानी भारतीय रेल के निजीकरण की चर्चा अब बवाल का रूप लेती जा रही है।

शुरू में जब इसको लेकर खबरें आईं कि रेल मंत्रालय ने 50 रेलवे स्टेशनों और 150 ट्रेनों के निजीकरण के लिए एक कमेटी बनायी गई तब केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल को बयान जारी करके कहना पड़ा कि “सरकार रेलवे का निजीकरण नहीं करने जा रही है, बल्कि निवेश लाने के लक्ष्य से पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप पर विचार कर रही है।”

लेकिन अब ऐसा लगता है कि रेल मंत्री का यह बयान लोगों में सरकार के फैसले के प्रति विश्वास जगाने के लिए नाकाफी है।

वैसे तो निजीकरण के ख़िलाफ़ रेल यूनियनों, राजनीतिक पार्टियों और छात्र संगठनों द्वारा पिछले कई दिनों से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

बिहार में रेल निजीकरण के विरोध में जबर्दस्त आंदोलन

बीते दिनों बिहार के कई शहरों पटना, आरा, सासाराम, नवादा, औरंगाबाद, समस्तीपुर आदि में जिस तरह हज़ारों छात्रों-युवाओं ने उग्र प्रदर्शन किया वैसा पहले नहीं हुआ था।

खास तौर पर सासाराम रेलवे स्टेशन पर जुटे हजारों छात्रों की भीड़ इतनी उग्र हो गई कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा, आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े, लाखों रुपये की रेलवे की संपति का नुकसान हुआ, 18 छात्रों को गिरफ्तार करके जेल में बंद करना पड़ा और बाकियों की तलाश के लिए एसआईटी छापेमारी कर रही है।

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