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उत्तराखंड : होली गायन सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की अनूठी मिसाल

@विनोद भगत 

देवभूमि उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को विभिन्न त्यौहारों पर सहेज कर रखे हुए हैं। होली पर तो समूचा उत्तराखंड सांस्कृतिक रंगों से रंग जाता है। उत्तराखंड में होली पर्व से पहले यहाँ के शहरों और गांवों में शाम होते ही होल्यारों की महफिलें सज जाती हैं। क्या वृद्ध और क्या युवा हर कोई होली के शास्त्रीय संगीत में डूब जाता है। 

कुमाऊं मंडल में होली पर एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है।  तबले की थाप, मंजीरे की खनखन और हारमोनियम के मधुर सुरों पर जब ‘ऐसे चटक रंग डारो कन्हैया’ गाते हैं, तो सभी झूम उठते हैं। 

यहाँ होली दो रुपों खड़ी होली और बैठकी होली के प्रचलित हैं।  बैठकी होली पौष माह से शुरू होकर फाल्गुन तक गायी जाती है। इस बैठकी होली में वैराग्य भक्ति विरह कृष्ण गोपियों की हंसी ठिठोली प्रेमी युगल की अनबन और देवर भाभी की छेड़छाड़ से भरपूर श्रृंगार रस का माहौल बना रहता है। पौष माह से बसंत पंचमी तक अध्यात्मिक बसंत, पंचमी से शिवरात्रि तक अर्ध श्रृंगारिक और उसके बाद श्रृंगार रस में डूबी होली गायन होता है।

उत्तराखंड की होली भारतीय समाज में एकता की अनूठी मिसाल है। हर वर्ग हर संप्रदाय इस दौरान होने वाली बैठकी होली में शामिल होता है। बैठकी होली न केवल उत्तराखंड वरन भारतीय विशाल सांस्कृतिक परंपरा का उदाहरण है। ‘

उत्तराखंड के समृद्ध लोकसंगीत की झलक अपने आप में समेटे बैठकी होली  यहाँ की संस्कृति में रच बस गई है। यह लोकगीत न्योली जैसे पारंपरिक लोकगीतों से भिन्न है। खास बात यह है कि कुमाऊं में होली गायन स्थानीय भाषा में न होकर ब्रज भाषा में है। इस दौरान गायी जाने वाली सभी बंदिशें राग रागनियों में गाई जाती है।। दिलचस्प बात यह है कि सामूहिक रूप से गायी जाने वाली यह  होली न तो सामूहिक गायन है और न एकल गायन समूह में शामिल कोई भी व्यक्ति बंदिश का मुखड़ा गाने लगता है। मुखड़ा गाने की इस परंपरा को यहाँ भाग लगाना कहते हैं।

उत्तराखंड के लोग देश में जहाँ भी गये अपने साथ होली गायन की इस परंपरा को लेते गये। देश के कई हिस्सों में उत्तराखंड की इस होली गायन की शैली की धूम मची हुई है। 

होली गायन के कुछ उदाहरण जो बसंत पंचमी से शुरू होती है। बसंत पंचमी में “नवल बसंत सखी, ऋतुराज कहायो पुष्पकली सब फूलन लागी फूलहि फूल सुहायो” के साथ शिवरात्रि में “जय जय शिवशंकर योगी, नृत्य करत प्रभु डमरू बजावत बावन धूनी रमायो” गाकर यह होली मनाते हैं। 

 गंगोलीहाट, लोहाघाट, चंपावत, पिथौरागढ़ एवं नैनीताल  उत्तराखंड में बैठकी होली के गढ़ माने जाते हैं। यहां के लोग मैदानी क्षेत्रों में जहाँ-जहाँ गए, इस परंपरा का प्रसार होता गया। परंपरागत संस्कृति को जीवंत रखने में होली गायन का अपना महत्व है।

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