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उत्तराखंड में आपदा से नुकसान नहीं होता अगर?

 

अभी भी डाप्लर रडार की बाट जोह रहा है राज्य 

वेद भदोला 

2013 में केदारनाथ में आई आपदा के बाद से उत्तराखंड में कुदरती कहर का सिलसिला अभी तक रुका नहीं है। हर साल कोई न कोई क्षेत्र आपदा से प्रभावित होता आ रहा है। राज्य की कई संकरी घाटियों में बादल फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं। असल में, बादल फटने की इन घटनाओं के पीछे निरंतर बदलती हुई जलवायु जिम्मेदार है।

मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाली निजी एजेंसी स्काइमेट के वाइस प्रेसिडेंट महेश पालावत कहते हैं, ”अगर एक ही जगह पर एक घंटे के भीतर सौ मिलीमीटर या उससे अधिक बारिश होती है, तो उसे मौसम विज्ञान की भाषा में बादल फटना कहते हैं। पहाड़ों में ऐसा अधिक इसलिए होता है क्योंकि बादल में तापमान की वजह से दरार जैसी हो जाती है।” हालांकि बादल फटने की घटनाएं मैदानी इलाकों में भी होती हैं लेकिन पहाड़ों में इनका असर ज्यादा घातक होता है।

पालावत कहते हैं, ”बादल कभी-कभी 12 से 15 किमी ऊंचे पानी के स्तंभ जैसे हो जाते हैं। ऊंचाई और हवा की कम रफ्तार की वजह से पहाड़ों में बादलों का आगे की तरफ बढऩा रुक जाता है तो घाटियों में फंसे बादल कम ही जगह में मूसलाधार बरसात करने लगते हैं। ढलान की वजह से पहाड़ों में यह पानी रफ्तार से नीचे की तरफ बहने लगता है और अधिक खतरनाक हो जाता है।”

उत्तरकाशी में आपदा के तीन दिन बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत प्रभावित लोगों का हाल-चाल लेने पहुंचे। मुख्यमंत्री के मुताबिक, ”आपदा से 70 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित हुआ है और सबसे अधिक असर जिले की मोरी तहसील पर पड़ा है। आपदा की जद में 52 गांव आए हैं, प्रारंभिक अनुमान के अनुसार इस आपदा में 130 करोड़ रुपए का नुक्सान होने का अनुमान है।”

मुख्यमंत्री बताते हैं कि इस मानसून सीजन में 59 लोगों की मौत के साथ ही अब तक कुल 55 लोग घायल हुए हैं और 12 लापता हैं। इस सीजन में प्राकृतिक आपदा से राज्य को कुल 170 करोड़ रुपये का नुक्सान आंका गया है। मुख्यमंत्री कहते हैं, ”राज्य के आपदा कोष में 320 करोड़ रुपये मौजूद है. ऐसे में केंद्र से पैकेज की जरूरत नहीं है।” इस दौरे से एक दिन पूर्व मुख्यमंत्री ने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की थी और उन्हें उत्तराखंड में अतिवृष्टि से हुई जन-धन हानि की जानकारी दी थी।

भाजपा नेता और उत्तरकाशी से राज्य कार्यकारिणी सदस्य लोकेंद्र सिंह बिष्ट कहते हैं, ”उत्तरकाशी जिले में बीते एक दशक से आपदा लगातार कहर बरपा रही है. वर्ष 2012 में असी गंगा घाटी तो 2013 में पूरे उत्तरकाशी जिले में भारी तबाही हुई. फिर 2016, 2017 व 2018 में भी यमुनोत्री, गंगोत्री, धराली, बणगांव में आपदा ने विकराल रूप दिखाया.
इस त्रासदी से कैसे बचा जाए, इसके लिए अभी तंत्र को बहुत कुछ करना शेष है।”

इसका जवाब पालावत देते हैं। वे कहते हैं, ”पूरे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में एक भी डॉप्लर रडार नहीं है।  सबसे नजदीकी डॉप्लर रडार पंजाब के पटियाला और जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में है। अगर राज्य को आपदा से बचाना है तो यहां कम से कम 5 या 6 रडार लगाने होंगे।इससे प्रशासन ऐसी आपदाओं के बारे में कुछ घंटे पहले चेतावनी जारी कर जान के नुक्सान को कम कर सकता है।”

उत्तराखंड के लगभग 370 गांव ऐसी जगह बसे हैं जहां आपदा आने पर सर्वाधिक नुक्सान संभावित है। 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने प्रधानमंत्री मोदी से इन सभी गांवों के सुरक्षित जगह में पुनर्वास के लिए कहा था और लगभग 10,000 करोड़ रु. की सहायता राशि मांगी थी। पर यह मांग वन भूमि की अदला-बदली जैसे पेंच में फंसकर रह गई। अब इंतजार है इस बात का कि सरकार डॉप्लर रडार लगाने में दिलचस्पी लेती है या गांवों के सुरक्षित जगहों पर पुनर्वास में।

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