आश्चर्यजनक :नेपाल की हिमाकत पर राष्ट्रवाद को सांप क्यों सूंघ गया?भारत सरकार ने विवादित नक्शे को लेकर अपील की नेपाल से

@ विनोद भगत 

भारत के पड़ोसी राष्ट्र जो कि हिन्दू राष्ट्र कहलाता है, की हिमाकत पर सोशल मीडिया में जरा-सी बात पर आक्रोश जताने वाले राष्ट्र भक्तों की खामोशी आश्चर्यजनक है। 

बता दें कि नेपाल ने बुधवार को अपना जो नया संशोधित राजनीतिक और प्रशासनिक मानचित्र जारी किया है ,उसमें भारतीय हिस्सों  लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपने क्षेत्र में बताया है। इससे पूर्व नेपाली  प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली कह चुके हैं कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा नेपाल के हैं।

यही नहीं उन्होंने इन क्षेत्रों को भारत से राजनीतिक और कूटनीतिक प्रयासों के जरिये ‘‘वापस लेने’’ की प्रतिबद्धता जतायी थी। इस नक्शे का अनावरण भूमि सुधार मंत्री पद्मा आर्यल ने संवाददाता सम्मेलन के दौरान किया। संसद को संबोधित करते हुए ओली ने कहा था कि ये क्षेत्र नेपाल के हैं ‘‘लेकिन भारत ने वहां अपनी सेना रखकर उन्हें एक विवादित क्षेत्र बना दिया है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘भारत द्वारा सेना तैनात करने के बाद नेपालियों को वहां जाने से रोक दिया गया।’गत दिनों ओली की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की एक बैठक में एक नए राजनीतिक मानचित्र को मंजूरी दी गई, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल के क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया। मंत्री आर्यल ने कहा कि नया नक्शा संविधान की अनुसूची में अद्यतन किया गया है और इसे सरकारी कार्यालयों में रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि इसे आवश्यक संविधान संशोधन के लिए संसद में पेश किया जाएगा।

आर्यल ने कहा कि नेपाल सरकार इस मामले पर भारत के साथ बातचीत करेगी और इस मुद्दे को कूटनीतिक प्रयासों से हल किया जाएगा। उन्होंने यह भी विश्वास व्यक्त किया कि भारत इस मामले पर सकारात्मक तरीके से विचार करेगा। विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली ने इस घोषणा से कुछ हफ्ते पहले कहा था कि कूटनीतिक पहलों के जरिए भारत के साथ सीमा विवाद को सुलझाने के प्रयास जारी हैं।

नेपाल की सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के सांसदों ने भी लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को लौटाने की मांग के संबंध में संसद में एक विशेष प्रस्ताव पेश किया है। लिपुलेख दर्रा नेपाल और भारत के बीच विवादित सीमा, कालापानी के पास एक दूरस्थ पश्चिमी स्थान है। भारत और नेपाल दोनों कालापानी को अपनी सीमा का अभिन्न हिस्सा बताते हैं। भारत उसे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा बताता है और नेपाल इसे धारचूला  जिले का हिस्सा बताता है।

हालांकि भारत सरकार ने इस पर अपनी आपत्ति जताई है लेकिन भाजपा के तमाम प्रवक्ता इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। वहीं तमाम राजनीतिक दलों के अन्य प्रवक्ताओं का भी इस मामले पर कोई खास प्रतिक्रिया नजर नहीं आ रही है। यह अपने आप में चिंताजनक है कि आखिर एक छोटे से राष्ट्र की इस हिमाकत पर लोगों के राष्ट्रवाद को सांप क्यों सूंघ गया है?

भारत की प्रतिक्रिया

भारत ने इस संबंध में प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि नेपाल का इस तरह से नक्शे में बदलाव स्वीकार्य नहीं है।नेपाल, भारत की संप्रभुता का सम्मान करे। दोनों देशों ने जो मैकेनिज्म बना रखा है इस तरह की समस्याओं को हल करने का उसके तहत ही मामले को सुलझाएं. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने नेपाल के नक्शे में बदलाव को लेकर कहा है कि भारत और नेपाल के बीच इस तरह के सीमा संबंधी मुद्दे द्विपक्षीय समझ और डिप्लोमेटिक डायलॉग के जरिए हल किए जाने चाहिए।

भारत की तरफ से विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने साफ कहा है कि इस तरह का बदलाव भारत को स्‍वीकार्य नहीं है।नेपाल इस मामले पर भारत की पोजीशन को अच्छी अच्छे तरीके से जानता है। हम नेपाल सरकार से अपील करते हैं कि वह भारत की एकता और अखंडता का सम्मान करे। हमें उम्मीद है कि नेपाल की लीडरशिप दोनों देशों के बीच सकारात्मक माहौल बनाएगी और बातचीत से मसला हल होगा।

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